Ashwani Bhardwaj / Sat, Feb 21, 2026 / Post views : 297
शिमला/देहरा: हिमाचल प्रदेश के पहले राष्ट्रीय स्तर के स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रिंस गर्ग द्वारा मनोरंजन जगत से 'सम्माजनक रिटायरमेंट' की घोषणा ने प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। लेकिन इसे केवल एक कलाकार की विदाई कहना गलत होगा; असल में यह हिमाचल के उन अहंकारी प्रशासनिक अधिकारियों और दोषपूर्ण सरकारी नीतियों के मुंह पर एक तमाचा है, जिन्होंने सालों से स्थानीय प्रतिभाओं को हाशिये पर धकेला हुआ है।
खबरों और खुद प्रिंस गर्ग के बयानों से साफ है कि हिमाचल सरकार और मेलों के आयोजक (प्रशासनिक अधिकारी) प्रदेश के बजट का बड़ा हिस्सा बाहरी राज्यों के कलाकारों पर पानी की तरह बहा रहे हैं। 'पहाड़ी अस्मिता' का दम भरने वाला प्रशासन अपनों को मंच देने के नाम पर न केवल कतराता है, बल्कि उनके साथ जो व्यवहार किया जाता है, वह किसी अपमान से कम नहीं है।
प्रिंस गर्ग का यह फैसला इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि आज हिमाचल के सरकारी मंचों पर 'प्रतिभा' नहीं बल्कि 'पहचान और सिफारिश' चलती है। अधिकारी उन कलाकारों को तरजीह दे रहे हैं जिनकी सोशल मीडिया पर 'फेक चमक' है या जिनकी पहुंच सचिवालय के गलियारों तक है। 20 सालों तक हिमाचल का नाम रोशन करने वाले कलाकार को अगर आज यह कहना पड़ रहा है कि 'सिस्टम की बेरुखी ने हद पार कर दी', तो यह हिमाचल की सांस्कृतिक नीतियों की सबसे बड़ी विफलता है।
क्यों हिमाचल के सरकारी मेलों में स्थानीय कलाकारों को दोयम दर्जे का समझा जाता है?
क्या प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ 'करोड़ों के बजट' और 'बाहरी ग्लैमर' को ही सफलता मानते हैं?
टेट (TET) की परीक्षा के प्रश्नपत्र में जिस कलाकार का नाम सम्मान से लिया गया, उसे मंच पर सम्मान देने में प्रशासन को क्या तकलीफ थी?
चेतावनी: प्रिंस गर्ग का मंच छोड़ना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि प्रदेश के उन हजारों युवा कलाकारों के लिए एक चेतावनी है जो अपनी जड़ों से जुड़कर कला को जीवित रखना चाहते हैं। अगर सरकार और प्रशासन ने अपना रवैया नहीं बदला, तो आने वाले समय में हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाएगी।
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